यूं तो बदल चुका है सब कुछ,
मगर वो बाकी है मेरे अंदर आज भी कहीं,
भुला देना चाहता हूं उसे,
महफूज है मगर आज भी दिल के इक कोने में,
भाग रहा हूं वक्त की दौड़ में,
वक्त थम सा जाता है मगर आज भी उसके आने से,
सीख गया हूं खुद को खुद से छिपाना,
ईमानदार बन जाता हूं मगर आज भी उसके सामने,
भूल गया हूं मुस्कराना,
लब मुस्करा जाते हैं मगर आज भी उसके होने से,
हां......यादें,
वो मीठी सी यादें ही तो है
बहते पानी सी जिंदगी में पीछे छूट जाती हैं जो,
चली आती हैं फिर वक्त-बेवक्त कभी भी,
और फिर जिनके आने से चल पड़ता हूं मैं,
अपने ही अंदर छिपे हुए खुद को ढूंढने के लिए,
यूं तो बदल चुका है सब कुछ,
मगर वो बाकी है मेरे अंदर आज भी कहीं।।
Wah bhai ..shandaar ..
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