कब से जतन किए, लेकिन बन तो नहीं पाया था।
उम्मीदों के पंखों से, अब तक उड़ तो नहीं पाया था।।
बात सिर्फ इंसान बनने की थी तो ठीक थी, पर काबिल तो नहीं बन पाया था।
इन बहते झरनों की तरह, निश्छल तो नहीं बन पाया था।।
भाग रहा था जिंदगी की इस दौड़ में, लेकिन अब तक जीत तो नहीं पाया था।
जीतने की चाह क्यूं थी, ये अभी तक जान तो नहीं पाया था।।
दौड़ा, गिरा, उठा फिर दौड़ा लेकिन मंजिल को अब तक देख तो नहीं पाया था।
रंगमंच की कठपुतली है हम सब यहां, ये सच अब तक जान तो नहीं पाया था।।
पर अब एक धुंधला सा उजियारा दिखा है, दूर क्षितिज में।
जिंदगी के सफ़र में जाना किस डगर है, अब ये देख पाया हूं।।
जीत जाऊंगा ये दौड़ जिंदगी की, मन में ये ठान पाया हूं।
आशाओं की नई फूटती कोंपलों से बनता जिंदगी का वटवृक्ष देख पाया हूं ।।
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