Friday, 21 April 2023

मेरा कमरा

एक कमरा था कोने में

न दीवार चिनाई सोने में

न रंग हुआ हर दीवाली पे 

न खिड़की प न जाली पे।


हर अलसाई उनींदी रातो में

हर किस्से और मुलाकातों में

वो वही खड़ा था विरल अटल

कुछ मासूम चल आये पैदल।


खुली कभी किताबें, कभी सुरा

न माना कभी किसी बात बुरा

पन्ने पलटे और छलके जाम

मेरे चार यार है नहीं आम।


यूँ बीत गए वर्ष मास दिवस

इम्तिहान हुए न टस से मस

हम जीत गए हम हार गए

सब अपने अपने द्वार गए।


अब यार बन गए सरकारी

नहीं हुई मुलाकाते भारी

सूना कमरा प्रभात निशा

कोई आये इस शहर दिशा।


मैं आस लगाता हूँ अवकाश

फिर से आये वो समय काश

महफ़िल का रास्ता मेरा घर

फिर से गूंजे सबका स्वर।


ये मन का कपड़ा अभागा है

मैं सूई हूँ तू धागा है

क्या मोल लगेगा पिरोने में

एक कमरा था कोने में।

5 comments:

  1. सुंदर कविता 👍👌

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  2. अति उत्तम

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  3. उम्दा लिखावट 👏👏

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  4. Richa Chaudhary21 April 2023 at 21:15

    सुंदर रचना, बहुत ही अच्छी

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