हो सके तो ढूंढ लो,
सुकून का वो दरवाजा,
खुलता हो जो उस पुरानी दुनिया में,
जी सको जहां फिर से बचपन तुम अपना।
हो सके तो ढूंढ लो,
खुशियों की वो खिड़की,
झांक सको जहां से वक्त के उस पार,
देख सको जहां तुम खिलखिलाते हुए अपने आप को।
हो सके तो ढूंढ लो,
जज्बातों का वो समंदर,
चल सको जिसके किनारे कुछ कदम नंगे पैर,
सहेज सको जहां कुछ पुराने रिश्ते फिर से।
हो सके तो ढूंढ लो,
अपनेपन की वो गीली मिट्टी,
बो सको जिसमें हरे भरे परिवार की पौध,
सींच सको जिसे प्यार और अपनेपन से।
हो सके तो ढूंढ लो,
यादों के वो झरोखे,
आवाज दे सको जहां से अपने उन दोस्तों को,
छोड़ आए जिनको आगे बढ़ने की दौड़ में।
हो सके तो वक्त निकाल लो,
अपने आज के लिए,
ताकि कल अफसोस न हो,
अपने कल के लिए।।
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